वेलेन्टाईन डे के दिन मैं अकेला बैठा सोचता हूँ,
यदि हम उससे इतना दूर न होते
तो हम भी कान से कान तक मुस्कुराते,
आँखों में उसके लिए ढेर सा प्यार,
मिल जाते किसी रेस्तरां में पिज्ज़ा खाते।
वह देखती हमारी ओर और हम उसकी ओर,
नज़रें चार होती हमारी और हम दुनिया को भूल जाते,
प्रतीत होता ऐसा जैसे बीच में हम और आसपास खेत हैं लहलहाते,
खामोश इशारों से होती दिल की बातें,हर पल के साथ युग बीतते जाते,
कुछ वह कहती अपने दिल की,
कुछ हम कहते,
बिना होंठ हिलाए ही सब कुछ बयान कर जाते।
यूँ ही अनंत काल तक रहता वह समां बंधा,
न करता जब तक आकर वेटर भंग मेरी तंद्रा,
बिल देकर देखता वह मेरी ओर,
जैसे भूल की हो मैंने कोई घनघोर,
सस्ते में ही काम लिया निबटा,
दिन अवसर न सही,
हमने तो उसका भी ख्याल न किया!!
मुस्कुराकर उसकी(किसकी?)
ओर भरता मैं बिल,
सोच मन ही मन में
कि चलो बच गया डूबते डूबते ये दिल।
बहरहाल फ़िलहाल हम छूट गए सस्ते में,
अब आगे न जाने कैसे कैसे भुगतान करने पड़ेंगे,
सुलटा भी पाएँगे या लेने के देने पड़ेंगे।
र्म किया है तो फल की भी आशा करते हैं,
पर मन माफ़िक मिलेगा या फ़िर रहेंगे हम तरसते?
इसी उधेड़बुन में बैठा,
रहा था दिमाग खपा,
तभी खुले मेरे ज्ञान चक्षु,
गूँजी मेरे कर्णों में गीता,
कर्म है मनुष्य के हाथ में, नहीं है
फल का चुनाव,
जैसा कर्म किया है वैसा ही तो फल मिलेगा!!
अच्छा था सपना वह जो अचानक ही टूट गया,
पाया कि कमबख्त मोबाईल था बज रहा,
फ़िर मन ही मन में मुस्कुरा मैंने सोचा,
अच्छा ही है जो नहीं है वो यहाँ,
वरना हम भी डूब गए होते उसके सागर से भी गहरे नयनों में,
खोज रहे होते हर जगह हमारे घर वाले,
और मित्र गण सोच कर दुखिया रहे होते,
कि एक
और भाई को निगल गए इश्क के कातिल कोहरे।